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जब लगी मुझ को


जब लगी मुझ को 

दिल तो कच्चा है जी 
छोटा सा बच्चा है जी 
जब लगी मुझ को ............

सच्चा कहा एक दिन 
लगे बून ने वो धागे छुटे छुटे से बीन 
जब लगी मुझ को ............

एक निकर एक पैजामे से छुटे से 
भाग रहा वो बचकर अपने से 
जब लगी मुझ को ............

फंस रहा था बेगने में 
क्या करता अब गुसल खाने में 
जब लगी मुझ को ............

बेतुक बेबक नजर निहार रही 
अजीबो गरीब बाहार आ रही 
जब लगी मुझ को ............

नाक के केश झुलस से गये
धरती कितने बम अब गिर से गये 
जब लगी मुझ को ............

टुकडा था ताड़ बेजार हुआ 
फेफड़ों का कपंन धाड़ पर सवार हुआ 
जब लगी मुझ को ............

पेट कब्ज की लहर छायी 
नब्ज धमनी धीरे नजर आ रही अब 
जब लगी मुझ को ............

सुगंध बेस्वाद कर गयी 
दिल के बच्चे बेकरार कर गयी 
जब लगी मुझ को ............

दिल तो कच्चा है जी 
छोटा सा बच्चा है जी 
जब लगी थी मुझ को ............

एक उत्तराखंडी 

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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