
गुमनाम मै
काश ! कभी याद आ जाऊँ?
यूँ ही गुमनाम मै रह जाऊँगा
रह रहकर अक्षरों में कंही गुन गुनाऊँगा
लिखे जो लेख गजल गीत मैंने
वो ही आप के लिये छोड़ा जाऊँगा
कभी हसाऊँगा कभी रुलाऊँगा
बीते पल में किसी दिन छुट मै जाऊँगा
दो घड़ी याद भी मै आ जाऊं कभी
पहलों के पलो में तेरी यूँ बंध जाऊँगा
जुदा ही हूँ मै तुझसे यूँ ही अब तक
फिर भी तेरे पास ही सदा पाया जाऊँगा
धुल खा रही होगी मेरी लिखी किताब
कभी तू आके कोई छंटेगा मेरा वो हिजाब
तब जाकर मै अपना मक़ाम पाऊँगी
फिर खिल के कली सी मै गुन गुनाऊँगी
यूँ ही गुमनाम रह जाऊँगा
रह रहकर अक्षरों में कंही गुन गुनाऊँगा
गुमनाम मै
काश ! कभी याद आ जाऊँ?
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

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