ADD

मन के खेल में


मन के खेल में

मन के विचारों के
अंतकरण विचारों से

अपनी बुद्धि से
हे मानस
उस
लक्ष्य को केंद्रित कर

मत अपना अपना है
समझ उसकी अपनी

मन और पेट में
वो सोच ऊठ कर
आज
कंहा पर चल दी

४० सेर की तौल
एक मन एक मन से

साधारण-बुद्धि वो
दिमाग़ कि
चल दी
चित्त को भ्रमित कर

शिरस्राण राह मन
अपने बने मकान में

सही गलत के निवार
के निवारण में
जीवन गया
मन के इस खेल में

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
बालकृष्ण डी ध्यानी
Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ