मन के खेल में
मन के विचारों के
अंतकरण विचारों से
अपनी बुद्धि से
हे मानस
उस
लक्ष्य को केंद्रित कर
मत अपना अपना है
समझ उसकी अपनी
मन और पेट में
वो सोच ऊठ कर
आज
कंहा पर चल दी
४० सेर की तौल
एक मन एक मन से
साधारण-बुद्धि वो
दिमाग़ कि
चल दी
चित्त को भ्रमित कर
शिरस्राण राह मन
अपने बने मकान में
सही गलत के निवार
के निवारण में
जीवन गया
मन के इस खेल में
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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