क्या शांत हुआ ?
जल गयी तन चिता
धुंआ बन मन बस उड़ा
राख हुयी अहम काया
हवा पानी धरा किनारा
मिल गया अपने से
भागा जिस सच्चे सपने से
उसने अपना लिया मुझे
फिनके सा लाल तप के
अब भी लपक रहा
किस तरंह वो झपक रहा
चिर चिर कर ख़ाक हुआ
क्या चिरशांत हुआ
मोह और पनप रहा
दूर राह से टपका रहा
घर धड़ छोड़कर भी
आत्मा वो भटक रहा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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