ठेला मेरा
मेरा भी
ठेला लगा है
राग-द्वेष छोड़ो
बस प्रेम से
ही वो चला है
मट्टी का
घड़ा है वो
शीतल जल से
भरा है वो
त्प्त ना इसे
इतना किया करो
भाप बन शीघ्र
कंही उड़ जाये ना वो
आंसूं को
अब लगाम दो
एक मुस्कान से
अब जीवन संवार दो
मुफ्त सेवा है ये
ले लो जितना
उतना बड़ा मेवा है
हर वक्त खुला
मेरा ठेला है
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
बालकृष्ण डी ध्यानी


0 टिप्पणियाँ