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वो सुबह


वो सुबह

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

कल्पना कि पतंग
उड़ने को बेकरार है
सीमा प्रान्त देश सारे
बंधन को तोड़कर

खुले आकाश में
विचरण करने को
ऊपर निचे दाँयें बांयें
उड़े खोल के बांहे

डोर जोड़ी जोड़कर
मोड़े कलम अपनी
मोड़े उस छोर पर
बैठा आज सोचकर

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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