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बसंत पंचमी


बसंत पंचमी

किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर

मिटे प्रतीक्षा के अब क्षण
गीत गया उसने मल्हार का
रंग बिरंगी रंग खिले हैं
फूलों संग भौंरें मिले हैं

ऋतु कि यह कुसुमाकर
आयी वो लेके यौवन बहार
विरह मिलन के खुले क्षण
चहुँ और हर्षित खिले मन

नवल युगागम शारदे माँ
स्वर्ग धरा सफलम् सुफलम्
रचित हो मेरे ह्रद्य सदा माँ
सुंगधित कविता प्रति पल

किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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