अंतःस्थल कि अराजकता
शनि-का-विभिन्न-राशियों-पर-प्रभाव.
या है फिर अंतःस्थल कि अराजकता
आम कि सोच फैली अब फिर आम रास्तों पर
ख़ास अब भी बैठा वातानाकूलित कमरों में
सिर उठ जाता है अब भी वो खास
थोड़ी भी हलचल होती है आम के अंगस्थलों में
बाँध कर रखना चाहता है उसे वो अक्सर
अपने विचारों और इशारों कि नियमों संग
गुरु शुक्रु बधु मंगल सोम रवि का तोड़-जोड़ है
या फिर शनि कि पटल लिखी आम कि परिभाष
सूर्य चन्द्र अँधेरे उजाले उथले और उभरे अंगों में
पैरों के छालों संग आम कि अंतःस्थल अराजकता
आम कि सतह सतत जारी है .......
अंतःस्थल कि अराजकता आज मेरी कल तुम्हारी
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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