राख के ढेर पर
राख के ढेर पर बैठा मै
बस इस को मनाता ही रहा
मै इसको सजाता ही रहा
ये ना माना कभी
ना मै इस को मना पाया कभी
बस वो रूठता ही रहा
बस वो माँगता ही रहा
मै माँग पूरा करता ही रहा
उसकी माँग बढ़ती ही गयी
भौतिक अस्तित्व उसका क्या था
मै उस नश्वर का मचान बनता रहा
उसका अहम बढ़ता ही रहा
गीली लकड़ी सूखने बेकरार
सूख गयी जलने से इनकार
वो सच्चाई को झुठलाता ही रहा
क्या थी वो काया,क्या था उसका लक्ष्य
कर्म मेरा मै अब भी ना समझ पाया
बस वो यूँ ही भटकता ही रहा
राख के ढेर पर बैठा मै
बस इस को मनाता ही रहा
मै इसको सजाता ही रहा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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