वो चाँद
दो चाँद खिले है
आज दिखे हैं
एक घूँघट में
एक बदली में
वो आज छिपे हैं
दो चाँद खिले है
कह दो हवाओं से
सरका दो वो बादल
कह दो उन निगाहों से
ढलका दो वो आंचल
जो आज छिपे हैं
दो चाँद खिले है
तड़पा ना इतना
ना तरसा ना इतना
रहम कर दो हम पर
इस पर्दे को रुक्सत कर
वो आज छिपे हैं
दो चाँद खिले है
ढल ना जाये रात
कर ले थोड़ी मुझसे बात
रह ना जाऊँ बस
मै इस तरह तुझको ताक
वो आज छिपे हैं
दो चाँद खिले है
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
बालकृष्ण डी ध्यानी


0 टिप्पणियाँ