नारी कभी तो
एक पथ में
अनेक रहें जुड़ी
फिर भी अकेली
क्यों खड़ी ऐसे
वो रहें उसकी
किसके इंतजार में
कवायद दिन रात
एक अनसुलझी सहेली
कैसी वो पहेली
ममता छांव कि
अपने गांव कि
प्रियतम प्रेम कि
बांहे फ़ैली हुयी
सुनी गलियों खड़ी
अब भी मिलेगी
वो अंधेरा छटेगा
किरण पौ फटेगा
उसके अन्धकार में
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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