इन्तजार तेरा रहेगा
चकबंदी है
एक अधिकार है एकत्रीकरण का
घनीभवन करनी है इस मातृ भूमि की
पहड़ों से टूटने का दर्द
क्या होता है
अपनों से छूटने का मर्ज़
क्या होता है
तुझे क्या पाता ? , तुझ पे गुजरी है क्या
हाँ मुझे चाहिये चकबंदी
इससे हटेगी मेरे पहाड़ों की मंदी
खिलेगा फूलेगा ये पहाड मेरा
मिलेगा फिर से मुझसे प्यार मेरा
चकबंदी ने राह दिखाई
तू कहाँ.....कहाँ है मेरे भाई
देख दिल ने फिर ऐ आवाज लगायी
पहड़ों पहाड़ों से टकरा के आयी
गरीब क्रांति ने आस जगाई
फिर मुझे उस ने मेरी रूह से मिलायी
अपनों की फिर याद आ गयी
कदम चलने लगे दूँ की राह अपने आप
आठ मार्च बस इतना याद रखना
मैं तो चल पड़ा हूँ
अब कब आप का चलना होगा
पर इन्तजार तेरा फिर भी पहाड़ करेगा
चकबंदी है मेरे पहाड़ के लिये
मेरे खेती और मेरी बहार के लिये
आना जरूर
इन्तजार तेरा रहेगा
ये दिल धड़कता है बस अपने पहाड़ के लिये
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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