आच कुजाण किलैई
आच कुजाण किलैई
मी थे ये धरा पर तुमरी याद ऐग्याई
बाबा निच घौर मेरा
बोई ये पहाड़ मा हर्ची गैई
सब देख्दा मी थे अचरज
मि देख्णु तुम थे अचरज
सोच्णु मि मा मी
कया गड़बड़ घोटल व्हैग्याई
कन भली सजींचा देका
अपरा पहाड़े का डंडा कांठा
मी छों यख रागमत हुँयों
भौल तुम बी यख रागमत हुणा ऐ जावा
सुपनियों का रंग छन बिखरयाँ
या च मेर या तुमरी नजरि का दोष
कन ये धरा से फुंड तुम हुंया छन
ऐ जावा अब बी तुम बच्युं जोश
बस जी मिल बोल्याली
आपरी छूटो मूक खोल्याली
ना कैरा तुम कैकि सिकसैरी
अपरा पहाड़ बौडी जावा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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