आँखों कु हेर दे कि
आँखों कु हेर दे कि ऊ हुनर चली ग्याई
माया लगे छे एक बौल्या दगड झण ऊ कख चली ग्याई
दिस की ऊ काम धाणी रति की ऊ नींदि ग्याई
क्वी बंडोल की म्यारु सारू शोर लेकि चली ग्याई
बयार च एक ऊ मौल्यार रंग कु खैल गैल्या बी
मेरी देली मा धौलेकि फूल विंकि सूंघ कख चली ग्याई
वैका ही हिक्मत दगडी जीयु मा आच घाम बी गेणा बी छन
देकि ऊ अपरी खुद कु ऊ सुबैर ऊ राति चली ग्याई
कख कख दैली दैली कब भ्तेक भ्ट्कनु छे ये जियु
हम थे भूली की ऊ बाटा अपरी ठिकाण चली ग्याई
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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