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बिसरी किले नि जांद?


बिसरी किले नि जांद?

आणु नि पहाड़ मा त बिसरी किले नि जांद?
किले खुद धरिच संभली किले बिसरी नि जांद?

कै वास्त लिख्युं छे जिकोड़ी मा मेरु नौऊ
जबै आखर गलत व्हैगे त पुसै किले नि जांद?

खैरी विपदा पीड़ा रोजै की दुक से हम थे निकाला
जब तुम हमरा नि राई त किले बथा नि देन्द?

रै रै की ना इनि तत्रस दे ऐ मेरा बिगड़यां देबता
तुम अपरा हाता से मिथे बिस किले पिलाई देन्द?

जब मेर निष्ठ पर तुम थे बिस्वास निछई
त मिथे तुमरि नजरि भत्ते किले चुला नि देन्द?

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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