भला भला बोल से रे भक्ता
मन मा चढ़ी खोट
तब जीकोडी लगी चोट
इं चोट से बची जारे भक्ता
अपरू बाटा तू खुद ही खोजा
भला भला बोल से रे भक्ता
अपरू पोट भौर रे अपरू पोट भौर
ना टाळ ना टाळ
ईं पीड़ा थे दूर , क्ख्क दूर
रिगलंण रैण रे वैल सदा
तेर जीकोडी का खौळ
भला भला बोल से रे भक्ता
अपरू पोट भौर रे अपरू पोट भौर
कैल संभली कैल नि संभली स्की यख
गिचोड़ी कैकि कैल नि पकड़ी स्की
बोलण से पैली सोचिले
अपरा कर्म थे खुद ही खोजिले
भला भला बोल से रे भक्ता
अपरू पोट भौर रे अपरू पोट भौर
ना तू कैकु ना क्वी तेरु
दोई दिना की दुनिया रे
किले की कण रे यख
ऊ च तेरु ऊ च मेरु
भला भला बोल से रे भक्ता
अपरू पोट भौर रे अपरू पोट भौर
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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