कन कन लोक ऐ जांदा
कन कन लोक ऐ जांदा हमरा जीयू थे जलाण बान
अपरि अपरि पीड़ा कथा लेकि हम्थे सुनाणा बान
मेरा बाना ऊ बिरणा छंन ऊँका बाण मी अजाण
फिर एक जग कु रीत च ऐ जांदी वैथे निभांणा बान
ऊं बिगेर मि रै नि सक्दु ईं पीड़ा खैरी भरयूँ सौंसार मा
मेरी ई मजबूरी च ऐ जांदी विंकि याद दिलाणा बान
सबुकु ऐकि की चुप रैंदु जिकोड़ी की छविं नि कर दा
आंदा जाँदा जीणा का बी लाखा भाना ऐ जांदा
अब पड़यूँ छों दोई लगुला का बीच मा तणयूँ छों
अपरी लाचारी कु वेग और्री भेद बीच फस्युं छों
ऐ जावा तुम बी अब मेर हैंसी उड़ाणा बान
मि पड़यूँ छो दस बरसा भती मिथे टांगणा बान
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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