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मैं जला उस मशाल की तरह ………………


मैं जला उस मशाल की तरह ………………

मैं जला उस मशाल की तरह
अँधेरे को राह दिखाते उस प्रकाश की तरह

मैं बना उस आकाश की तरह
अपने भीतर को खोजते उस संत की तरह

मैं बना उस समंदर की तरह
अच्छी बुरी चीजों को समाते विश्वम्भर की तरह

मैं बना इस धरती की तरह
त्याग ही सब कुछ है सीखते उस वृक्ष की तरह

मैं खड़ा उस पहाड़ की तरह
चुपचाप सृजन करते उस विशाल की तरह

मैं बहा उस नदी की तरह
पल पल प्यास मिटते उस जल की तरह

मैं चला उस सफर की तरह
मुश्किलों से घिरते लड़ते उस पड़ाव की तरह

मैं जला उस मशाल की तरह ………………

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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