कभी कभी ये लफ़्ज कमजोर क्यों
कभी कभी ये लफ़्ज कमजोर क्यों
पड़ जाते इन बहते आँसूंओं के समीप
जबान थर थराती है ओंठ कांप जाते हैं
अपने बीते पल जब आँखों में छा जाते हैं
कुछ भी कहने की हालत में वो नहीं रहता
इस गले में वो कैसा दर्द जब आ फंसता
अपनी बेबसी का ये आलम वो ऐसे ही
यूँ सब के सामने चुप रह के वो कह देता
एक एक आँसूं उसकी तकलीफें बयां कर देता
अचानक ही वक्त समीप आ कर गुजर जाता है
कभी कभी ये लफ़्ज कमजोर क्यों
पड़ जाते इन बहते आँसूंओं के समीप
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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