बेटी मेरी तेरे लिये
रोज दिये की लौ की तरह
जलता हूँ मैं जलता हूँ मैं
बेटी तेरे सुख के खातिर
पल पल इसे मचलता हूँ मैं
देखा है जो सपना तू ने
बांध लिया है जो मन में अपने
उसकी वो सड़क बनाता हूँ मैं
तेरी इच्छा के ईंट लगाता हूँ मैं
पल पल ऐसे आगे बढ़ते रहे तू
हर डगर पर मजबूत हो आगे चले तू
तेरे लक्ष्य के धनुष पे बाण चढ़ता हूँ मैं
तुझे उस मछली की आँखें दिखता हूँ मैं
निर्बल नहीं तुझे सबल बनान है मुझे
इस दुनिया को चार आँखें दिखाना है तुझे
तेरे हर पग पग पर रानी लक्ष्मी बाई चले
तेरे हर जन्मदिन पर यूँ ही हजारों दिये जले
तेरा पिताजी बालकृष्ण डी. ध्यानी
बालकृष्ण डी ध्यानी


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