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एक उम्मीद


एक उम्मीद

पहाड़ मेरे खड़े हुये हैं
बर्फ को ओढ़े सोये हुये हैं
बह रही है हवा यंहा मध्यम
कड़कती सर्दी को वो सह रहे हैं
पहाड़ मेरे खड़े हुये हैं ...............

पहाड़ मेरे भीगे हुये हैं
बूंदों बूंदों से वो लिपटे हुये हैं
कभी मचल जाती वो बिजली उन पर
डरे वो सहमे से वो लग रहे हैं
पहाड़ मेरे भीगे हुये हैं ……………

पहाड़ मेरे जले हुये हैं
गर्मी से शुष्क और बिखरे हुये हैं
पानी पाने को मचा है हाहाकार
अकेल अकेल वो लोग लगे हुये हैं
पहाड़ मेरे जले हुये हैं ……………

पहाड़ मेरा चुपचाप खड़ा है
शांत गंभीर सा वो अब तक लग हुआ है
अभी भी एक उम्मीद को बंधे खड़ा वो
ना जाने क्यों आती सड़क को निहार रहा है
पहाड़ मेरा चुपचाप खड़ा है ……………

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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