मेरी इच्छा
अगर मैं खत्म हो गया यंह पर
पर ये यात्रा खत्म होने वाली नहीं
चार लकड़ियों के साथ
मेरी इच्छा जलने वाली नहीं
राख सो जायेगी मट्टी के गोद में
पर सपने सोने वाले नहीं
रहेंगे भटकते इधर उधर
लेकिन वो साया फिर दिखेगा नहीं
अंकगणित की आशायें ऐसे
एक पल में खत्म नहीं होती
जलते रहेंगे वो शांत चंद्रमा के जैसे
जलते रहेंगे वो तेजस्वी तारों के जैसे
बुझने वाले वो दिये की तरह
अंधेर फैलाये चारों ओर
गोधली बेल जब आयेगी
काले कपडे पहनकर
उस समय
वो डूबा सूर्य उदय हुआ होगा कहीं ओर
उसकी उष्णता ऐसे खत्म होने वाली नहीं
बुझी हुयी मशाल जैसे
फिर जला दी जाये
उन असंतोष हाथों में वो
होगी शुरू
एक नई यात्रा की
उसी रस्ते को पकड़ के
पहुंचेगा वो एक दिन
परिवर्तन के उस क्षितिज पर
तब तक उसकी पलकें
तूफ़ान में भी एक पल झपकेंगी नहीं
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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