ADD

मेरी इच्छा





मेरी इच्छा

अगर मैं खत्म हो गया यंह पर
पर ये यात्रा खत्म होने वाली नहीं
चार लकड़ियों के साथ
मेरी इच्छा जलने वाली नहीं
राख सो जायेगी मट्टी के गोद में
पर सपने सोने वाले नहीं
रहेंगे भटकते इधर उधर
लेकिन वो साया फिर दिखेगा नहीं
अंकगणित की आशायें ऐसे
एक पल में खत्म नहीं होती
जलते रहेंगे वो शांत चंद्रमा के जैसे
जलते रहेंगे वो तेजस्वी तारों के जैसे
बुझने वाले वो दिये की तरह
अंधेर फैलाये चारों ओर
गोधली बेल जब आयेगी
काले कपडे पहनकर
उस समय
वो डूबा सूर्य उदय हुआ होगा कहीं ओर
उसकी उष्णता ऐसे खत्म होने वाली नहीं
बुझी हुयी मशाल जैसे
फिर जला दी जाये
उन असंतोष हाथों में वो
होगी शुरू
एक नई यात्रा की
उसी रस्ते को पकड़ के
पहुंचेगा वो एक दिन
परिवर्तन के उस क्षितिज पर
तब तक उसकी पलकें
तूफ़ान में भी एक पल झपकेंगी नहीं

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार
बालकृष्ण डी ध्यानी
Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ