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ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की



ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की

ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की
अद बाट मां जो हम थे छोड़ी की अग्ने चली गयां
ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की

कख व्हाला वो अब क्या कण व्हाला वो
ईन सै की निर्जक सिन्कोली कण कै राला वो
ऊं की छुई अब हम थे ऊं की याद दिलांदी
कबी हैसंदी कबी खूब रुवैई की जांदी

दगड छोड़ी कि वो दगड्या मेरा
अचाणचक कख बौडी की कख चली गयाँ
सवय व्हैगे छे मि थे तेर अब ते बिगर करमत नि
खोज्नु छों मि ते थे गैल्या देख्णु छे कया तू मिथे

ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की .................

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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