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क्यों गुरुर है


क्यों गुरुर है

क्यों गुरुर है मुझ को मुझ पर इतना
जब जीवन है बस एक टूटा हुआ सपना
फना होना है जब इस मिट्टी को मुझमे
यूँ अकड़ के और मुझे चलना है कितना

ध्यानी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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