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बल जी वे कया काम का



बल जी वे कया काम का

फुर्र उडी की जांद जी
बौडी की नि आंदा जी
सुप्निया मेरा आँख का
बल जी वे कया काम का

अपरा अपरा करदा जी
गैरों का वो नि सोचदा जी
विकास मेर पहड़ा का
बल जी वे कया काम का

नशा नशा करदा जी
वै थे देखिक लोक हसदा जी
अब दारू रोका थाम की
बल जी वे कया काम की

आँखा का अंधा हुंया जी
काला चस्मा आंख्युं चढ़ा जी
देखणा छण बस नामा का
बल जी वे कया काम का

नत व्हैकि आच खड़ा छन
बल जी क्या आच काम पड्या छन
चुनवा ऐगे अब पहड़ा का
बल जी वे कया काम का

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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