अपने से ही
जब ज्याद की सोचता हूँ मैं
कम ही हाथ आता है मेरे
कम ही हाथ आता है
जब अकेले होता हूँ मैं
वो ग़म साथ चला आता है मेरे
वो ग़म साथ चला आता है
फिर भी मिटती नहीं ऐ आस मेरी
पगों से सनी धूल ऐ बताती है
रोज सवेरे उठते ही नये स्वप्न संग
वो खूब ललचाती वो मचलाती है
धूल फाकने को चला जाता हूँ
दोपहरी लथपथ हो आता हूँ
ढूंढती रहती है पथ मंजिल का
पेड़ों की छाँव में ही सकुन पाता हूँ
अंधेर छाते ही गुम हो जाती है
थक हार जब शाम लौट आती है
रात के अँधेरे बैठी देहली फिर
इन्तजार नये स्वप्न का करती है
हाथ कुछ नहीं आता है
वो स्वप्न फिर टूट फुट सा जाता है
निराशा संग आशा के पलंग पर
फिर एक बार मैं सो जाता हूँ
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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