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बहुत कम शब्द हैं


बहुत कम शब्द हैं

बहुत कम शब्द हैं
पिता के लिए
बहुत ढूंढने में लगे
पिता के लिए

पिता शब्द की
कोई परिभाषा नहीं है
अपनों में खोया है वो कहीं

गुमसुम सी मूरत है
ना जाने कैसी  सूरत है
ठीक से  देखा नहीं

रहता है साथ
धीरज दिलाता है
सुरक्षा विशवास जगाता है

कैसे बेचैनी है
कैसा वो समंदर है
सुख दुःख बस अंदर है

टोह लगाने में उसकी
मै असमर्थ हुआ
पिता बना तब महसूस हुआ

बहुत कम शब्द हैं

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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