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बेबस


बेबस

मन जब असहाय होता है
बेसहारा बेबस लाचार सा वो रोता है

अपने से विवश हो कर वो
अपने को ही अपने में खोता है

मजबूरी के बुने उधेड़बुन रिश्तों में
असमर्थता की उभरी तख्ती लटकती है

कमजोर है कहना है उन लकीरों का
दुर्बलता जब घूंट ब घूंट खुद उबलती है

मस्तक पीटता है अपने आप से खीजता है
अपना होना उस पल जब ना होने सा रिस्ता है

बहुत जोर से चीखती रही वो चिल्लाती  रही
अंतर्मन के शून्य में फिर कहीं वो खो जाती रही

चेहरे पर अपने होने का वो बस भाव छोड़ जाती है
बेबस होकर अकेले अपने में जब वो लौट आती है

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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