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भाग२६घपरोल

भाग२६  

सुबेर-सुबेर घपरोल

" आजो गढवालि चुटकला" "

श्रीमती जी," इना सुणो जरा। कन बिजोग प्वाड़ । ये धर्मू न आफ खुणि ब्यौलि आफिक ढूंढि याल। डैर क मार तुमार सामणि बि नि आणू ।"
श्रीमान जी," बड़ी खुशी क बात च। "
श्रीमती जी," क्या? मेरी क्या सुंदर नौनि ढूंढीं छै वेखुणि आपरि तरां।"
श्रीमान जी," फिर त हौर भी खुशी क बात च।
आपरि तरां सूर्पनखा ढूंढी रै व्हैलि तेरी। जू वा भि जिंदगी भर वैक कपाऽल तचाणि रैंद। जन म्यार कपाऽल व्है ग्याई खरड़ू।"
श्रीमती जी," क्या! मि त आज ही मैत चलि जांदू ,पर धर्मूं ब्यौ तक रुकि जांद। तब खेलि माछा।"
श्रीमान जी," अबि जा। उन बि कोरोना म लिमिटेड लोग लिजाणन बरात मा। त्यार जगा पर पुष्पा बौ नम्बर आलू बरात मा जाणा कू।"
श्रीमान जी," हैं। अब त कतै नि जाण्या मि मैत।'


विश्वेश्वर प्रसाद-(सिलस्वाल जी)

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